बचपन से सुना था की इस सृष्टि में माँ की ममता से बड़ा कोई सुख नहीं होता है और शायद यही सो़च आज मुझे 9 फरवरी 2009 को उस स्थान से दबे हुए एहसासों के साथ उसके घर से लौटने पर मजबूर कर रही था और उस काली शाम 23 नवम्बर 2008 ने फिर से मुझे घेरना शुरू कर दिया जिसने मेरे सबसे बड़े आत्मविश्वास और बल को मुझसे छीन लिया | 21 नवम्बर की वो शाम जब मैं बनारस में एक विवाह में शामिल होने गया था और अचानक फ़ोन आता है कि "अगर अभिषेक से मिलना है तो तुरन्त आ जाओ क्योकि उसके पास सिर्फ 15 से 30 मि० ही है", कुछ क्षण के लिए तो कुछ समझ में नहीं आया कि मै झूठ कि किस दुनिया में पहुँच गया हूँ तभी अंकित का फ़ोन आता है कि अभिषेक हम सबको छोड़ कर चला गया | जिस स्थल पर मै मौजूद था वहाँ न ही अवसर था और न ही यो़ग कि मेरे साथ मौजूद मेरे पिताजी मेरे आँसुओं को बहते देख अन्दाजा न लगा सके कि कुछ अनहोनी हो चुकी है, और उनके पूछते ही मै अपना धैर्य खो चुका था | ठीक उसी समय हम बनारस से वापस लौट चुके थे, रास्ते में मुझे अभिषेक त्रिपाठी से अपनी पहली मुलाकात याद आने लगी जब मैने उसे दसवीं कक्षा में पहली बार भाषण बोलते हुए सुना था, एक ही कक्षा में होने के बावजूद हमारे सेक्सन अलग थे इसीलिए शायद कभी इतना ध्यान नहीं दिया था उस शख्स पर, मगर उस दिन उस मध्यम कद के साथ गोल चेहरे पर साँवली मुस्कान लिए उसका तेज और विचारो कि गम्भीरता को सुनकर एवं देखकर जहाँ ख़ुशी महसूस हो रही थी वाही अपने सामने एक प्रतिद्वदी को देखकर थोडी बहुत विचलता भी महसूस हो रही थी | मगर संयोग ही था उसी वर्ष हम लो़ग विद्यालय कि ओ़र से बनारस टूर पर गये वहाँ पर उसका सौम्य व्यवहार और विचारो में समानता ने न जाने कब हमें इतना करीबी बना दिया था कि मैने उससे निवेदन किया था कि बनारस पर लिखी मेरी कविता को वह असेम्बली में अपनी आवाज़ दे और उसका बड़प्पन था कि उसने सहज रूप से मेरे आग्रह को स्वीकार ही नहीं अपितु गले से उसे लगा दिया |
निरन्तर कई प्रतियोगिताओ को जीत कर वह मेरी जुबान में अभिषेक त्रिपाठी से डिवेट त्रिपाठी बन चुका था और हम सबका सबसे चहेता यार भी | शिक्षको में उसको लेकर अत्यन्त लगाव स्पष्ट दिखाई पड़ता था | उसकी लोकप्रियता और विलक्षण प्रतिभा के बल ने ही उसे 11 वी में अपने रेड हाउस का कैप्टेन बना दिया और 12 वी में स्कूल का हेड ब्वाय | जहाँ वह सभी का चहेता बन चुका था वही कोई और था जो उसकी चाहत बन चुका था | उम्र के इस पड़ाव पर किसी के प्रति इतना समर्पण और लगाव शायद ही मैने कभ महसूस किया था | किसी ने सच कहा है कि जब कोई चीज सुन्दर और सुखद महसूस होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि आगे कोई बड़ी अनहोनी होने वाली है |
वह दिन भूले नहीं भूलता जब शारीरिक विज्ञान कि प्रयोगात्मक परीक्षा सन 2003 में हो रही थी और अचानक एक बलिष्ट शारीर बिलकुल शिथिल हो गयी और सभी उसे लेकर नजदीक के अस्पताल में पहुँच गये और विभिन्न परीक्षणों के पश्च्यात पता चला कि उसकी दोनों किडनियाँ फेल हो चुकी है | यह घटना जितनी जल्दी घटी थी उससे ज्यादा तेज यह खबर सभी तक पहुँच चुकी थी | किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया था कि कुछ दिन पहले दौड़ प्रतियोगिता में पुरस्कार जितने वाला अभिषेक इस तरह के कष्ट से जूझने वाला था | उसके माँ - बाप के लिए मानो यह खबर उन्हें तेजी मार देने वाली थी कि उनका एकलौता पुत्र इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी कठिनाइयों के भँवर में फस चुका था | जहाँ तक मुझे याद है कि शायद उस शाम के बाद आज तक उसकी माँ ने पूरी नीद नहीं ली होगी क्युकी आज भी वह अपनी डिमडिमाती आँखों से उसका इन्तजार कर रही है | इन कठिनाइयों के बीच उसने 12 वी की परीक्षा दी और अच्छे परिणाम के साथ उत्तीर्ण भी हुआ मगर अब तक उसकी आँते पूरी तरह सिकुड़ गयी थी और उसे बड़े अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ उसकी माँ ने एक किडनी देकर जीवनदान देने की कोशिश की | कोशिश रंग भी ला रही थी, विद्यालय एवं सभी संबंधो से पूरा सहयोग भी मिल रहा था और इसी कड़ी में सन् 2008 में उसको देश के ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय (आई० आई० आई० टी० ) इलाहाबाद में एम० बी० ए० में प्रवेश भी हो चूका था | अब तक तो मानो हम सभी को लगने लगा था कि अगर इरादे मजबूत हो तो मौत से भी लड़ा जा सकता है | इसी दौरान उसके नेत्रित्व में दो बार पुरातन छात्र सम्मलेन भी हो चूका था | और तीसरे पुरातन छात्र सम्मलेन 2008 में इस कार्यक्रम कि पूरी अगुवाई मुझे सौपते हुये कहा था कि अब अपने विश्वविद्यालय के कामो से बहुत व्यस्त हूँ और अब से तुम्ही इसे सम्भालो और मेरा सहयोग लेते रहना | कुछ क्षण के लिए तो अप्रत्याशित सा लगा मगर पढाई और उसके अन्य विषयों में बढती रुचि को देखकर मुझे उसका जवाब उचित सा ही लगा | मुझे रास्ते भर न जाने कोण सी शक्ति कह रही थी कि उसने यह बाते भविष्य को दृष्टि में रखकर कही थी | उसी के सम्बोधन से सम्मलेन कि शुरुआत हुई और मेरे और अन्य साथियो के सहयोग से एक बेहद ही सफल सम्मलेन अगले वर्ष कि उम्मीद के साथ समाप्त को चुका था |
अक्सर मै उसे टोकता था कि तुमने हॉस्टल में रहकर पढाई करने का जो निर्णय लिया है वह पूर्णतः उचित नहीं है मगर बार बार उसका आत्मविश्वास और चेहरे पर बढ़ते तेज को देखकर मै अन्त में अपनी बात वापस ले लेता था |
हलांकि मै चाहता था कि वह प्रशासनिक सेवा कि तैयारी घर पर रहकर ही करे क्योकि बाहरी वातावरण और खान -पान उसके लिए उचित नहीं था | 13 नवम्बर 2008 को रूटीन चेकअप के लिए खुद ही गया और डॉक्टर के कहने पर खुद ही पाँच दिनों के लिए भर्ती हो गया | सभी ने 15 नवम्बर को "उसका जन्म दिन" बाधाइयाँ और सन्देश दिए मगर उसने किसी से नहीं बताया कि वह अस्पताल में है क्योकि वह नहीं चाहता था कि अन्य लो़ग उसकी वजह से परेशान व चिन्तित हों |
किसी ने अन्दाजा भी नहीं लगाया था और शायद उसने भी नहीं कि नॉर्मल रूटीन चेकअप में उसकी स्थिति लगातार ख़राब होती चली जायेगी | 26 नवम्बर से होने वाली परीक्षाओं के लिए वह ऐसी स्थिति में भी किताबे लेकर पढता ही रहता था | 18 नवम्बर से स्थिति और कष्ट दायक होती चली गई और दोपहर 23 नवम्बर को डाक्टरो ने भी जवाब दे दिया कि अब सिर्फ प्रार्थना कि जा सकती है | शाम को लगभग 6 बजते बजते व अंतिम समय में न जाने क्या कहने कि कोशिश करते करते अपने आँखे हमेशा के लिए मूँद ली थी |
अब तक मै उसके घर पर पहुँच चुका था और लगभग सभी परिचित चेहरे भी वहा मौजूद थे जिनकी आँखो को देखकर ही पूरी घटना का अन्दाजा लगाया जा सकता था | माँ तो मानो अपने होश में ही नहीं थी और उसके पिताजी तो मानो इतने कठोर हो चुके थे कि कोई सम्वेदना बची न हो | सिर्फ इतना बार बार कह रहे थे "मुझे नहीं पता था कि अभिषेक तुम्हे हमारे अलावा इतने सारे लोग भी चाहते थे |" छोटी बहन श्वेता को गाजियाबाद से आना था और लगभग रात के 3 बजे अपने भाई को चिर निन्द्रा में देखकर अपना धैर्य खो चुकी थी
सुबह होते विद्यालय के सभी अध्यापक दोस्त और सम्बन्धी पहुँच चुके थे और परम्परा के अनुसार उसकी अंतिम यात्रा की तैयारी में भी सभी न चाहते हुए भी अपना सहयोग दे रहे थे | उस क्षण मुझे जिले के एक अन्य विद्यालय "एस० जे० सी०" में आयोजित प्रतियोगिता की याद आ गई जब पहली बार हमारे विद्यालय ने अभिषेक के नेत्रित्व में वहाँ भाग लेकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था, और सभी ने उसे गोदी में उठाकर अपने उत्साह का परिचय दिया था और आज वाही लोग उसकी अंतिम यात्रा में कन्धा दे रहे थे | महर्षि पतांजलि विद्या मंदिर के सामने पहुच कर वहा की मिट्टी से उसको तिलक किया गया और सभी अध्यापको ने पुष्प अर्पित करके अपने स्नेह को प्रकट किया | घाट पर हमारे पहुँचने के पूर्व ही बहुत संख्या में लोग एकत्रित हो चुके थे उस पवित्र आत्मा के अन्तिम दर्शन के लिए | संस्कार होते रहे और उसके पिता ने जिन्होंने कभी यह सोचा था की मेरा पुत्र मुझे अग्नि देकर मुक्त करेगा वही पिता आज स्वयं अपने पुत्र को अग्नि देने पर विवश था | नम आँखों के साथ उसकी सबसे पसंदीदा लाइने जो मुझे एवं मेरे दोस्तों को याद आ रही थी और उम्मीद बंधा रही थी | जो अक्सर यह कहा करता था कि
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